
वे बताते हैं
कहीं दो मरे
कहीं छह मरे
कहीं दस ….
खबरें सिर्फ़ आंकड़े बताते हैं
और कहते हैं स्थिति नाज़ुक मगर नियंत्रण में है
ख़बर पढ़ता हुआ इसान मुखौटा पहने बिजुका लगता है
वह निर्जीव सा कहता है – ‘सिर्फ़ दो, छह या दस जाने गयी’
वह नहीं बता पाता कि वह ‘सिर्फ़’ नहीं था
वह था अपने परिवार की उम्मीद उनके सपने
वह था अपने बूढ़े पिता की लाठी
लाचार मां की आंखों का चश्मा
और अपने तुतलाते बेटे का दोस्त जिसने कहा था
‘इस बार जन्मदिन पर तायकिल लूंगा’
अपने बचपन के अक्स को बेटे मैं झांकता हुआ बोला था -हां हां ला दूंगा तायकिल
पत्नी जो दुबारा गर्भ से थी.
वह सोचता था इस बार नन्हीं सी परी घर में आयेगी
पत्नी अस्पताल में दर्द से कराहती हुई बार बार उसी का नाम ले रही है
और ख़बरें लाशों की गिनती बता रही है
सरकार मुआवज़ा की बात कर रही है
पिता गिर पड़ा बिना अपनेी सहारे की लाठी के
मां की आंख का चश्मा टूट गया
अब वह कभी नहीं देख पायेगी
बेटा अपने दोस्त से कह रहा है – मेरे पापा मेरे लिए नयी तायकिल लेने गयें हैं
अस्पताल में दर्द से कराहती पत्नी का क्या हुआ किसी को पता नहीं
ख़बरें आंकड़े बता रही है
दो मरे, छह मरे, दस मरे …
‘स्थिति नाज़ुक मगर नियंत्रण में है’.
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